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कर्ण पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
कथं नु हंसं वलिनं वज्राङ्गं दूरपातिनम् |  २१   क
काको भूत्वा निपतने समाह्वय़सि दुर्मते |  २१   ख
कथं त्वं पतनं काक सहास्माभिर्व्रवीषि तत् ||  २१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति