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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो रोषान्वितो जिष्णुः प्रमृज्य रुधिरं करात् |  २५   क
धनुरादत्त तद्दिव्यं शरवर्षं ववर्ष च ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति