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शल्य पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
विजय़े धृतसङ्कल्पाः समभित्यक्तजीविताः |  ३७   क
प्राविशंस्तावका राजन्हंसा इव महत्सरः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति