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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
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वैशम्पाय़न उवाच
स तदा तद्वचः श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमतः |  ८   क
तान्निवर्तध्वमित्याह न न्यवर्तन्त चापि ते ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति