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महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
भो भो राजन्नवेक्षस्व पतितोऽहं प्रिय़स्तव |  २४   क
किंनिमित्तं च पतनं व्रूहि मे यदि वेत्थ ह ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति