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वन पर्व
अध्याय १७८
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युधिष्ठिर उवाच
कथं स्वर्गे गतिः सर्प कर्मणां च फलं ध्रुवम् |  ८   क
अशरीरस्य दृश्येत विषय़ांश्च व्रवीहि मे ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति