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वन पर्व
अध्याय ७३
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केशिन्यु उवाच
ह्रस्वमासाद्य सञ्चारं नासौ विनमते क्वचित् |  ९   क
तं तु दृष्ट्वा यथासङ्गमुत्सर्पति यथासुखम् |  ९   ख
सङ्कटेऽप्यस्य सुमहद्विवरं जाय़तेऽधिकम् ||  ९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति