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भीष्म पर्व
अध्याय ७३
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सञ्जय़ उवाच
आत्मना हि कृतं कर्म आत्मनैवोपभुज्यते |  ३   क
इह वा प्रेत्य वा राजंस्त्वय़ा प्राप्तं यथातथम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति