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सभा पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
तर्पय़ित्वा द्विजश्रेष्ठान्पाय़सेन सहस्रशः |  १८   क
धनं वहुविधं दत्त्वा तेभ्य एव च वीर्यवान् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति