भीष्म पर्व  अध्याय ७३

सञ्जय़ उवाच

केकय़ा द्रौपदेय़ाश्च धृष्टकेतुश्च वीर्यवान् |  ५४   क
अभिमन्युं पुरस्कृत्य महत्या सेनय़ा वृताः ||  ५४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति