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वन पर्व
अध्याय १५
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कृष्ण उवाच
यज्ञे ते भरतश्रेष्ठ राजसूय़ेऽर्हणां प्रति |  ४   क
स रोषवशसम्प्राप्तो नामृष्यत दुरात्मवान् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति