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विराट पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो द्रौणिर्महावीर्यः पार्थस्य विचरिष्यतः |  ६   क
विवरं सूक्ष्ममालोक्य ज्यां चिच्छेद क्षुरेण ह |  ६   ख
तदस्यापूजय़न्देवाः कर्म दृष्ट्वातिमानुषम् ||  ६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति