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शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
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जनमेजय़ उवाच
तपसापि न दृश्यो हि भगवाँल्लोकपूजितः |  १२   क
यं दृष्टवन्तस्ते साक्षाच्छ्रीवत्साङ्कविभूषणम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति