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द्रोण पर्व
अध्याय ७३
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सञ्जय़ उवाच
अस्त्रे ते वारुणाग्नेय़े ताभ्यां वाणसमाहिते |  ४८   क
न तावदभिषज्येते व्यावर्तदथ भास्करः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति