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द्रोण पर्व
अध्याय ७३
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सञ्जय़ उवाच
ततो युद्धमभूद्राजंस्तव तेषां च धन्विनाम् |  ५२   क
रजसा संवृते लोके शरजालसमावृते ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति