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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वमाश्चर्यमेवैतन्निर्वृत्तं राजसत्तम |  १७   क
आदितो मनुजव्याघ्र कृत्स्नस्य जगतः क्षय़े ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति