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शान्ति पर्व
अध्याय ७४
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कश्यप उवाच
स्त्रिय़ं हत्वा व्राह्मणं वापि पापः; सभाय़ां यत्र लभतेऽनुवादम् |  १६   क
राज्ञः सकाशे न विभेति चापि; ततो भय़ं जाय़ते क्षत्रिय़स्य ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति