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वन पर्व
अध्याय १९७
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मार्कण्डेय़ उवाच
व्राह्मणं क्रोधसन्तप्तं ज्वलन्तमिव तेजसा |  १९   क
दृष्ट्वा साध्वी मनुष्येन्द्र सान्त्वपूर्वं वचोऽव्रवीत् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति