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शान्ति पर्व
अध्याय ७४
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कश्यप उवाच
पापस्य लोको निरय़ोऽप्रकाशो; नित्यं दुःखः शोकभूय़िष्ठ एव |  २७   क
तत्रात्मानं शोचते पापकर्मा; वह्वीः समाः प्रपतन्नप्रतिष्ठः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति