अनुशासन पर्व  अध्याय ७४

युधिष्ठिर उवाच

विस्रम्भितोऽहं भवता धर्मान्प्रवदता विभो |  १   क
प्रवक्ष्यामि तु सन्देहं तन्मे व्रूहि पितामह ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति