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अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
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भीष्म उवाच
वैश्यः स्वकर्मनिरतः प्रदानाल्लभते महत् |  २१   क
शूद्रः स्वकर्मनिरतः स्वर्गं शुश्रूषय़ार्च्छति ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति