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वन पर्व
अध्याय ७४
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वृहदश्व उवाच
सर्वं विकारं दृष्ट्वा तु पुण्यश्लोकस्य धीमतः |  १   क
आगत्य केशिनी क्षिप्रं दमय़न्त्यै न्यवेदय़त् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति