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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
रामं भर्तारमुत्सृज्य न त्वहं त्वां कथञ्चन |  २८   क
निहीनमुपतिष्ठेय़ं शार्दूली क्रोष्टुकं यथा ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति