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कर्ण पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
नानाश्वमातङ्गरथाय़ुताकुलं; वरासिशक्त्यृष्टिनिपातदुःसहम् |  ४   क
अभीरुजुष्टं हतदेहसङ्कुलं; रणाजिरं लोहितरक्तमावभौ ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति