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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
पूतात्मानश्च राजेन्द्र प्रय़ान्ति परमां गतिम् |  ५२   क
दशाश्वमेधिकं चैव तस्मिंस्तीर्थे महीपते |  ५२   ख
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र गच्छेत परमां गतिम् ||  ५२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति