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द्रोण पर्व
अध्याय ७४
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सञ्जय़ उवाच
नान्यस्य समरे राजन्गतपूर्वस्तथा रथः |  १२   क
यथा यय़ावर्जुनस्य मनोभिप्राय़शीघ्रगः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति