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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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कर्ण उवाच
शूरोऽय़ं समरश्लाघी दुर्मतिश्च द्विजाधमः |  ४   क
आसादय़तु मद्वीर्यं मुञ्चेमं कुरुसत्तम ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति