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विराट पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
उच्चावचं वलं ज्ञात्वा मध्यस्थं चापि भारत |  १०   क
प्रहृष्टमप्रहृष्टं च सन्दधाम तथा परैः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति