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द्रोण पर्व
अध्याय ७४
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सञ्जय़ उवाच
अनुविन्दस्तु गदय़ा ललाटे मधुसूदनम् |  २८   क
स्पृष्ट्वा नाकम्पय़त्क्रुद्धो मैनाकमिव पर्वतम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति