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कर्ण पर्व
अध्याय ३६
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सञ्जय़ उवाच
सम्पातं चान्वपश्याम सङ्ग्रामे भृशदारुणे |  ४   क
शलभा इव सम्पेतुः समन्ताच्छरवृष्टय़ः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति