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द्रोण पर्व
अध्याय ७४
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सञ्जय़ उवाच
व्रूहि कृष्ण यथातत्त्वं त्वं हि प्राज्ञतमः सदा |  ३७   क
भवन्नेत्रा रणे शत्रून्विजेष्यन्तीह पाण्डवाः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति