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द्रोण पर्व
अध्याय ७४
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सञ्जय़ उवाच
तमभ्यधावन्क्रोशन्तः क्षत्रिय़ा जय़काङ्क्षिणः |  ४२   क
इदं छिद्रमिति ज्ञात्वा धरणीस्थं धनञ्जय़म् ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति