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द्रोण पर्व
अध्याय ७४
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सञ्जय़ उवाच
अभ्यद्रवन्त वेगेन क्षत्रिय़ाः क्षत्रिय़र्षभम् |  ४५   क
रथसिंहं रथोदाराः सिंहं मत्ता इव द्विपाः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति