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द्रोण पर्व
अध्याय ७४
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सञ्जय़ उवाच
तत्र पार्थस्य भुजय़ोर्महद्वलमदृश्यत |  ४६   क
यत्क्रुद्धो वहुलाः सेनाः सर्वतः समवारय़त् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति