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द्रोण पर्व
अध्याय ७४
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सञ्जय़ उवाच
रथसागरमक्षोभ्यं मातङ्गाङ्गशिलाचितम् |  ५३   क
वेलाभूतस्तदा पार्थः पत्रिभिः समवारय़त् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति