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द्रोण पर्व
अध्याय ७४
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सञ्जय़ उवाच
ततो जनार्दनः सङ्ख्ये प्रिय़ं पुरुषसत्तमम् |  ५४   क
असम्भ्रान्तो महावाहुरर्जुनं वाक्यमव्रवीत् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति