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द्रोण पर्व
अध्याय ७४
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सञ्जय़ उवाच
वैणवाय़स्मय़शराः स्वाय़ता विविधाननाः |  ८   क
रुधिरं पतगैः सार्धं प्राणिनां पपुराहवे ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति