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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७५
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वैशम्पाय़न उवाच
स पतञ्शुशुभे नागो धनञ्जय़शराहतः |  १९   क
विशन्निव महाशैलो महीं वज्रप्रपीडितः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति