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कर्ण पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
एतत्तवैवानुरूपं कर्मार्जुन महाहवे |  ५८   क
दिवि वा देवराजस्य त्वय़ा यत्कृतमाहवे ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति