वन पर्व  अध्याय ७५

दमय़न्त्यु उवाच

न मामर्हसि कल्याण पापेन परिशङ्कितुम् |  १   क
मय़ा हि देवानुत्सृज्य वृतस्त्वं निषधाधिप ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति