वन पर्व  अध्याय ७५

दमय़न्त्यु उवाच

सैवं समेत्य व्यपनीततन्द्री; शान्तज्वरा हर्षविवृद्धसत्त्वा |  २७   क
रराज भैमी समवाप्तकामा; शीतांशुना रात्रिरिवोदितेन ||  २७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति