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उद्योग पर्व
अध्याय २२
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धृतराष्ट्र उवाच
दोषं ह्येषां नाधिगच्छे परिक्ष; न्नित्यं कञ्चिद्येन गर्हेय़ पार्थान् |  ४   क
धर्मार्थाभ्यां कर्म कुर्वन्ति नित्यं; सुखप्रिय़ा नानुरुध्यन्ति कामान् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति