वन पर्व  अध्याय ७५

दमय़न्त्यु उवाच

त्वामृते न हि लोकेऽन्य एकाह्ना पृथिवीपते |  ५   क
समर्थो योजनशतं गन्तुमश्वैर्नराधिप ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति