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विराट पर्व
अध्याय ४३
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कर्ण उवाच
रुक्मपुङ्खाः सुतीक्ष्णाग्रा मुक्ता हस्तवता मय़ा |  ४   क
छादय़न्तु शराः पार्थं शलभा इव पादपम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति