उद्योग पर्व  अध्याय ७५

भगवानु उवाच

भावं जिज्ञासमानोऽहं प्रणय़ादिदमव्रुवम् |  १   क
न चाक्षेपान्न पाण्डित्यान्न क्रोधान्न विवक्षय़ा ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति