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वन पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्वां राजन्मय़ा सार्धमजिनैः प्रतिवासितम् |  ४   क
भ्रातृभिश्च तथा सर्वैर्नाभ्यभाषत किञ्चन |  ४   ख
वनं प्रस्थाप्य दुष्टात्मा नान्वतप्यत दुर्मतिः ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति