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भीष्म पर्व
अध्याय ७५
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सञ्जय़ उवाच
ते शरा हेमपुङ्खाग्रा व्यदृश्यन्त महीतले |  ३०   क
विकर्णरुधिरक्लिन्ना वमन्त इव शोणितम् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति