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भीष्म पर्व
अध्याय ७५
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सञ्जय़ उवाच
अश्वान्मनोजवांश्चास्य कल्माषान्वीतकल्मषः |  ४७   क
जघान निशितैस्तूर्णं सर्वान्द्वादशभिः शरैः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति