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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
तं सात्यकिर्महाराज विव्याध दशभिः शरैः |  ३१   क
पश्यतां सर्ववीराणां मा गास्तिष्ठेति चाव्रवीत् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति