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द्रोण पर्व
अध्याय ७५
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सञ्जय़ उवाच
तेषां श्रमं च ग्लानिं च वेपथुं वमथुं व्रणान् |  १४   क
सर्वं व्यपानुदत्कृष्णः कुशलो ह्यश्वकर्मणि ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति